साहित्यिक कूडा

ये कविता लिखना लेख लिखना भी गजब ख्वारपीड़ का काम ठहरा हो .
लोगों को लगता है ये भी कोई मुश्किल काम है क्या ?
कविता लिखना भले ही मुश्किल ना हो पर इसके साइड इफैक्ट बड़े खतरनाक हैं
अब कल की ही बात लो बेटे ने कुछ पूछा मैने सहमति दे दी पर मैं कविता में घुसा पड़ा था ..सोचने लगा बेटे ने क्या पूछा होगा ..जब तक याद आया बेटा तब तक मेरे मोबाइल के अंजर पंजर कर चुका था ..मेरी साहित्य साधना का लाभ उठाकर पत्नी जी इस महिने चार साड़ियां खरीदकर अपने मायके भिजवा चुकी हैं हर बार मेरी सहमति लेकर .. हालांकि ये सहमति अर्ध चेतन अवस्था में प्रदान की गयी होती हैं .
बच्चों की कापी के पन्ने फाड़ने के जुर्म में अक्सर डांट खाना मेरी नियति बन चुकी है .
जब कभी कोइ लाइन याद आती है कागज के टुकड़े पर उतारना मजबूरी है .. डस्टबिन में कागजों के ढेर देखकर सफाई वाले ने मेरे घर से कूड़ा उठाने से साफ मना कर दिया .. पत्नी ने घर में तीन कूड़ेदान रखे हैं जिन पर बकायदा चिट चिपका रखी है - जैविक कूड़ा ... अजैविक कूड़ा ... और साहित्यिक कूड़ा .
साहित्यिक कूड़े वाला कूड़ेदान काम पर जाते समय मेरी साइकिल पर टांग दिया जाता है .
अब कविता के लिये भाव का आना जरूरी है . कमबख्त भाव कभी गुसलखाने में तो कभी रात के घुप्प अंधेरे में बिस्तर पर आते हैं . लिहाजा कभी बाथरूम की दीवार पर उतारने पड़ते हैं तो कभी साबुन के रैपर पर .
एक दिन रात के दो बजे कविता की एक लाइन आ गयी और लाइट जलाकर जैसे ही पैन कागज खोजना शुरू किया पत्नी जी की आंख खुल गयी .. मैने हड़बडाकर जैसे ही कदम वापस खींचने चाहे पत्नी का ताना पुराण चालू हो गया .. मेरी तो किस्मत ही ऐसी है .. इतना रात को उठकर तुमने स्कूल की किताबें पढी होती तो आज आदमी होते कवि नहीं . चुपचाप सो जाओ और मुझे भी सोने दो ..
इतने संधर्ष के बाद कविता अगर लिख ली तो फिर तो और भी भयंकर समस्या उत्पन्न हो जाती है ..कविता के लिये श्रोता ढूढने की .. एक मेरी दूसरी कक्षा में पढने वाली बेटी ही है जो चाकलेट के लालच में मेरी कविता पूरी तल्लीनता से सुनती है . बेटा तभी कविता सुनता है जब उसे नयीं जीन्स खरीदनी हो . पत्नी का तो अजब हाल है . साफ शब्दों में कह रखा है सौतन ले आओ झेल लूंगी पर खबरदार मुझे अपनी कविता सुनाई तो .
पडौस में लोग भी परेशान हैं कोई भी मुझे आता देखकर रास्ता बदल लेता है .. मेरी प्रसिद्धि का आलम यह है कि मेरे पड़ौसियों के यहां भी कोई किराये पर मकान  नहीं लेता ..
ब्याह शादी के निमन्त्रण लोग इस शर्त पर दे जाते हैं कि वहां काब्य पाठ कर मेहमानों को परेशान नहीं करूगा ..
हां इन सब के बीच कुछ फायदे भी हैं .मेरे धर पर अतिथि नहीं आते . पुलिस बिभाग के लोग अक्सर मुजरिमों से सच उगलवाने के लिये मुझसे पचास रूपया प्रति कविता के हिसाब से कविताऐ लिखवाने लगे हैं .
मेरी कविताओं के आतंक से बचने के लिये साहित्य पुरस्कार वाले मुझे सम्मान घर आकर हि थमा गये कि बाबा हमें माफ करो और अपनी प्रविष्ठि भी रख लो . पढते पढते दो सदस्य कोमा में चले गये हैं .

Comments

Popular posts from this blog

टमाटर प्याज

पहाडि होटल

अपुड्याट