नौला
गर्मियों में पहाड़ में पानी की कमी हो जाती है . मैने सोचा एक नौला बनवा दिया जाय हल्द्वानी अल्मोड़ा के बीच में कहीं पर . जब ठेकेदार से बात की तो खरचा काफी बताया . मैने सोचा क्यों न चन्दा कर लिया जाय ?
अब अपनी पहचान तो साहित्यकारों कवियों से ही है . सोचा चलो इसी बिरादरी से लेते हैं चन्दा . मैने कवियों की लिस्ट बनाई और पहुंच गया एक एक के घर . वहां जाकर कवि मित्रों से जो सहयोग मिला वो सुनाता हूं उन्ही की जुबानी --
राजेन्द्र पन्त ' राजन ' -
नमन है बन्दन है अभिनन्दन है इस नेक काम में
नौले बनने चाहिये हर कस्बे हर ग्राम में ..
पर बहुवों से कहना सस्कार दिखाना .
पानी भरने हमेशा घूंघट में ही आना ..
नौले के लिए चन्दा तो मैं नहीं दूंगा .
मैं तो नौले पर कविता लिखूंगा .
कविता के माध्यम से कमाल कर दूंगा .
कविताऐ लिख लिख कर ही नौला भर दूंगा .
रोली दूंगा तिलक दूंगा चन्दन दूंगा इस काम को .
नमन है बन्दन है अभिनन्दन है इस नेक काम को .
( मेरी बोहनी तो खराब हो चुकी थी . फिर भी भगवान का नाम लेकर आगे बढा . बारी थी ललित राठौर शौर्य जी की . सोचा युवा हैं ओजस्वी हैं जरा ज्यादा चन्दा मिलेगा )
ललित राठौर ' शौर्य -
बनाऐगे नौला हर घर में
सुन ले पाकिस्तान ..
एक एक नौले में लेगे हम
तेरे एक सैनिक की जान .
हर नौले को भर भर कर
हम खास बना देगें .
नामो- निशां मिटाकर
तुझे इतिहास बना देंगें ..
नौले भी बनवाऐगे हम
खूब करेंगे चन्दा ..
पहले तेरी गरदन में
डालेगे मोटा फन्दा .
( यहां भी हाल पहले जैसा ही रहा . आगे बढा तो कुमांऊनी ते प्रसिद्ध हास्य कवि शंकर जोशी जी Shankar Joshi Kumaoni Kaviके पास गये )
शंकर जोशी ' पनुवा ' -
बड़ाला हो पन्थ ज्यू बड़ाला
किले नी बड़ाला .
जरूर बड़ाला .
पुर उत्तराखंड में बड़ाला
मिलबेर बड़ाला . नौल जरूर बड़ाला .
तौ नौल बटी स्यैणी पानि ल्याल .
क्वे नाणा लिजी आल .
क्वे उनन कैं चाणा लिजी आल .
कबै कबै म्यर पनु ले पानि पीणा लिजी आल .
आल .. सब आल ..
किलै नी आल ..
तौ नेक काम में सबनोकै सहयोग कराओ .
सबन कैं जगाओ .
मेर पास तो पैंस नहातैं ..
द्वि बाल्टी पानि म्यर बाब छैं लिजाओ .
( बाप रे मामला अभी वैसा ही था फिर भी आगे बढा . मैने रुख किया दिल्ली श्री सुरेश पन्त जी की तरफ . भाषाविद गुणी बुजुर्ग हैं . मैने सोचा वहा तो चन्दा अवश्य मिलेगा )
सुरेश पन्त जी -
पोथी .. ये नौला शब्द बना है नल धातु से .
ये शब्द अरबी का है .
अरबी को पहाड़ी में गडेरी भी कहते हैं .
इसके .
तमिल तेलगू कन्नड
मैं भी मतलब निकलते हैं .
जहां तक है चन्दे की बात .
आजकल मेरा बटुवा है तेरी ताई के पास ..
अब पहुचा काठगोदाम निवासी राजेन्द्र जी
के पास .
राजेन्द्र ढैला ' दआदि ' -
हम भी नौलों में जाते हैं
जाकर सपनों में खो जाते हैं .
अब यहां भाबर में कहां हैं नौले .
यहां तो सिडकुल है
मकान बदलने में ही बिक जाते हैं तौले
कैसे दूं दाज्यू तुमको चन्दा .
मकान मालिकों ने डाल रखा है गले में फन्दा ..
( मायूस हो आगे बढा अब ज्ञान पन्त दाज्यू .. लखनऊ गया तो
पहले अपने गमले दिखाये फिर बोले )
ज्ञान पन्त जी --
जिम कार्बेट पार्काक शेर
और बिनसरा क ढड़ू ...( ढड़ू - बिल्ला )
कभै कभै सोचू
इनर के न के मतलब
तो हुनै हुन्योल ...
( मैल सोची तौ द्वि चार शेर और मारौ यां बटी
निकलण में फैद छ .)
अब पहुचा महेन्द्र ठकुराठी जी Mahendra Thakurathiउप
सम्पादक पहरू के पास ..
महेन्द्र ठकुराठी ..
म्यार गौं म्यार पहाड़न में कतु छन नौला .
पाणी की गागैरि हमि भरी बेर
लूंला ..
म्यार पहाड़ा शान छन जान यो नौला .
म्यार देशा पहाड़ा का अभिमान यो नौला .
खूब बड़ाया नौल खूब चन्द उघाया .
पैलि जाओ गौं पन पछिल मेछैं लिजाया .
( आब मैने सोचा एक बार भास्कर जोशी जी
के पास भी हो आऊं )
भास्कर जोशी ' पागल ' -
मैं पागल पहाड़ी
नौला डांसी ढुंग से बनेगा
उसके नीचे लगेगा लमथर
मैं ठहरा गेवाड़ घाटी का
दिल्ली में पहाड़ आता है याद
कभी हल्द्वानी कभी
केदारनाथ
कभी केजरीवाल कभी
मोदी .
(मैं ऐसी दर्दनाक कविता सुनकर भाग खड़ा हुवा ..
भास्कर जी कहते रह गये दाज्यू ये कविता तुम भले
ही मत सुनो इसे में अखबार में भेजूंगा .. तब तो
पढनी ही पड़ेगी ..मैने दौड़
तेज कर दी . रुका तो हरदौल वाणी के
सम्पादक श्री देवी प्रसाद गुप्ता
जी के सामने था . चन्दे की बात
की तो बोले -
देवी प्रसाद गुप्ता जी -
मंगलम् विनोद जी .
कालजयी नौला .
( और द्वार बन्द कर चले गये .अब नौला कैसे बनेगा ....? चन्दा
कहां से आऐगा ... पाठकगण राय दें )
अब अपनी पहचान तो साहित्यकारों कवियों से ही है . सोचा चलो इसी बिरादरी से लेते हैं चन्दा . मैने कवियों की लिस्ट बनाई और पहुंच गया एक एक के घर . वहां जाकर कवि मित्रों से जो सहयोग मिला वो सुनाता हूं उन्ही की जुबानी --
राजेन्द्र पन्त ' राजन ' -
नमन है बन्दन है अभिनन्दन है इस नेक काम में
नौले बनने चाहिये हर कस्बे हर ग्राम में ..
पर बहुवों से कहना सस्कार दिखाना .
पानी भरने हमेशा घूंघट में ही आना ..
नौले के लिए चन्दा तो मैं नहीं दूंगा .
मैं तो नौले पर कविता लिखूंगा .
कविता के माध्यम से कमाल कर दूंगा .
कविताऐ लिख लिख कर ही नौला भर दूंगा .
रोली दूंगा तिलक दूंगा चन्दन दूंगा इस काम को .
नमन है बन्दन है अभिनन्दन है इस नेक काम को .
( मेरी बोहनी तो खराब हो चुकी थी . फिर भी भगवान का नाम लेकर आगे बढा . बारी थी ललित राठौर शौर्य जी की . सोचा युवा हैं ओजस्वी हैं जरा ज्यादा चन्दा मिलेगा )
ललित राठौर ' शौर्य -
बनाऐगे नौला हर घर में
सुन ले पाकिस्तान ..
एक एक नौले में लेगे हम
तेरे एक सैनिक की जान .
हर नौले को भर भर कर
हम खास बना देगें .
नामो- निशां मिटाकर
तुझे इतिहास बना देंगें ..
नौले भी बनवाऐगे हम
खूब करेंगे चन्दा ..
पहले तेरी गरदन में
डालेगे मोटा फन्दा .
( यहां भी हाल पहले जैसा ही रहा . आगे बढा तो कुमांऊनी ते प्रसिद्ध हास्य कवि शंकर जोशी जी Shankar Joshi Kumaoni Kaviके पास गये )
शंकर जोशी ' पनुवा ' -
बड़ाला हो पन्थ ज्यू बड़ाला
किले नी बड़ाला .
जरूर बड़ाला .
पुर उत्तराखंड में बड़ाला
मिलबेर बड़ाला . नौल जरूर बड़ाला .
तौ नौल बटी स्यैणी पानि ल्याल .
क्वे नाणा लिजी आल .
क्वे उनन कैं चाणा लिजी आल .
कबै कबै म्यर पनु ले पानि पीणा लिजी आल .
आल .. सब आल ..
किलै नी आल ..
तौ नेक काम में सबनोकै सहयोग कराओ .
सबन कैं जगाओ .
मेर पास तो पैंस नहातैं ..
द्वि बाल्टी पानि म्यर बाब छैं लिजाओ .
( बाप रे मामला अभी वैसा ही था फिर भी आगे बढा . मैने रुख किया दिल्ली श्री सुरेश पन्त जी की तरफ . भाषाविद गुणी बुजुर्ग हैं . मैने सोचा वहा तो चन्दा अवश्य मिलेगा )
सुरेश पन्त जी -
पोथी .. ये नौला शब्द बना है नल धातु से .
ये शब्द अरबी का है .
अरबी को पहाड़ी में गडेरी भी कहते हैं .
इसके .
तमिल तेलगू कन्नड
मैं भी मतलब निकलते हैं .
जहां तक है चन्दे की बात .
आजकल मेरा बटुवा है तेरी ताई के पास ..
अब पहुचा काठगोदाम निवासी राजेन्द्र जी
के पास .
राजेन्द्र ढैला ' दआदि ' -
हम भी नौलों में जाते हैं
जाकर सपनों में खो जाते हैं .
अब यहां भाबर में कहां हैं नौले .
यहां तो सिडकुल है
मकान बदलने में ही बिक जाते हैं तौले
कैसे दूं दाज्यू तुमको चन्दा .
मकान मालिकों ने डाल रखा है गले में फन्दा ..
( मायूस हो आगे बढा अब ज्ञान पन्त दाज्यू .. लखनऊ गया तो
पहले अपने गमले दिखाये फिर बोले )
ज्ञान पन्त जी --
जिम कार्बेट पार्काक शेर
और बिनसरा क ढड़ू ...( ढड़ू - बिल्ला )
कभै कभै सोचू
इनर के न के मतलब
तो हुनै हुन्योल ...
( मैल सोची तौ द्वि चार शेर और मारौ यां बटी
निकलण में फैद छ .)
अब पहुचा महेन्द्र ठकुराठी जी Mahendra Thakurathiउप
सम्पादक पहरू के पास ..
महेन्द्र ठकुराठी ..
म्यार गौं म्यार पहाड़न में कतु छन नौला .
पाणी की गागैरि हमि भरी बेर
लूंला ..
म्यार पहाड़ा शान छन जान यो नौला .
म्यार देशा पहाड़ा का अभिमान यो नौला .
खूब बड़ाया नौल खूब चन्द उघाया .
पैलि जाओ गौं पन पछिल मेछैं लिजाया .
( आब मैने सोचा एक बार भास्कर जोशी जी
के पास भी हो आऊं )
भास्कर जोशी ' पागल ' -
मैं पागल पहाड़ी
नौला डांसी ढुंग से बनेगा
उसके नीचे लगेगा लमथर
मैं ठहरा गेवाड़ घाटी का
दिल्ली में पहाड़ आता है याद
कभी हल्द्वानी कभी
केदारनाथ
कभी केजरीवाल कभी
मोदी .
(मैं ऐसी दर्दनाक कविता सुनकर भाग खड़ा हुवा ..
भास्कर जी कहते रह गये दाज्यू ये कविता तुम भले
ही मत सुनो इसे में अखबार में भेजूंगा .. तब तो
पढनी ही पड़ेगी ..मैने दौड़
तेज कर दी . रुका तो हरदौल वाणी के
सम्पादक श्री देवी प्रसाद गुप्ता
जी के सामने था . चन्दे की बात
की तो बोले -
देवी प्रसाद गुप्ता जी -
मंगलम् विनोद जी .
कालजयी नौला .
( और द्वार बन्द कर चले गये .अब नौला कैसे बनेगा ....? चन्दा
कहां से आऐगा ... पाठकगण राय दें )
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