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मेरी माँल यात्रा 2

#माँलयात्रा २ हमारे सामने सामने जमान् हाईटैक हो गया . अब इसके साथ ना चले तो भुस्स कहलाते हैं और साथ चलनें में भयंकर आफत हुई . कल बेटी ने कहा मौल घुमा लाओ पिक्चर देखेगे . सच कहूं तो ये मौल होल को सोचकर ही मेरी ख्वारपीड हो जाती है . हमने गांव के ग्वैट में चलना सीखा ठैरा .. ताल खेत से माल खेत फटक मार कर जाने वाले हुए . वहां घुर्र वाली सीडियां .. अल्जी कर घुरीने का डर . फर्श ऐसा चुपड होता है जैसे हमारे चौमास में हमारे पहाड के बाट हो जाते हैं . चप्पल ज्वाते रडने का डर . ऐसे चलना पडता है जैसे नई नई ब्वारी नौले में पाणी भरने जाती है .  कदम रडे और आदमी रडा घ्वास्सस्स ... खैर मेरी पहली माल यात्रा आप फेसबुक में तीन चार साल पहले पढ चुके होंगे .. आज की ये दूसरी यात्रा थी . पिक्चर हौल के गेट पर तलासी देनी ठैरी .  खाने पीने का सामान झोला झमटी सब जाम करने वाले हुए .. भीतर एक भूटे हुए घ्वागे का पैकेट एक सौ सत्तर का ठैरा .. सब चीजें इतनी महंगी कि आप सपरिवार गये हों और सबने एक एक चीज भी खाई तो म्हैण भर का राशन साफ .. पिक्चर हौल मान्तर मस्त था .. भीतर ठन्डी ठन्डी बांजाणि की जैसी हवा चल रही...