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Showing posts from 2019

रत्तिब्याण

रत्तिब्याणक टैम भै . बिस्तर में पड़ी भयूं . भला भाल स्वैण उण लागि भै . तात लागि भै लिहाफ भितर . तब तक घरवाईक आवाज पड़न बैठ गे कान न में . उठो हो . उठो . सुड़नौछा . उठो . मैलि सुड़ियैकि नि सुणी करि दी . घनघोर नींद आइयाक नखार लगै दी . घरवाई ले कम नि भै . वीलि मेर हाथ खींचबेर लझोड़न शुरू कर दी . मैल को - कि करनैछी तस . तमीज कां गे तेरि . बैग छ्यूं त्योर . प्यारैलि नि उठै सकनी . उठो जानूं उठो डार्लिंग कैबेर उठूनी . समयाक सांथ चली कर . देख धें दुन्नि कां पुजि गे . घरवाई - होय सब देखि रयूं मी दुन्नि कां पुजि गे . सारि दुन्नि नैध्वे बेर पुज पाठ करि बेर बैठ गे . तुमैरि चारि लिफाफ भीतर पाद नि मारड़य दुन्नि . उठो फटाफट नाण ध्वैण करो . मैल बिस्तर उठूण छ . क्वे भीतर आलौ कि कौल ? मैलि कौ - त्यार मुख बटी भलि बात कबै नि आलि . और यदुक ठंड में नाण क नाम झन लिये . ठंडैलि जुकाम लागि गे या बीमार पड़ि गेयूं तो को रौल जिम्मेदार . मैसैलि आपुण जतन आपुण हाथैलि करण चें . घरवाई - जि बजर पाड़छा पाड़ो . नाण नि लाग रया तो कम से कम तौ मूखक टाल तो खुकल लिओ . त्यार बारक दिन छ . और तौ चाहा धरि र...

प्रकृति के रंग

ये धरती कितनी प्यारी है कितने खूब नजारे हैं . पल पल रंग बदलते मौसम कितने प्यारे प्यारे हैं . कभी शाम सिंदूरी होती इन्द्रधनुष बन जाता है कभी भास्कर चमक बिखेरे चन्दा प्यारा आता है . नीला अम्बर छतरी जैसा कितने सारे तारे हैं पल पल रंग बदलते मौसम कितने प्यारे प्यारे हैं ये धरती कितनी प्यारी है कितने खूब नजारे हैं . रिमझिम रिमझिम बरखा रानी जब फुहार बन आती है छम छम नाचे मन मयूर कोयलिया गीत सुनाती है . चन चन चिन चिन करते पंछी देखो कितने सारे हैं पल पल रंग बदलते मौसम कितने प्यारे प्यारे हैं ये धरती कितनी प्यारी है कितने खूब नजारे हैं . आसमान को छूते पर्वत सागर की गहराई है पेडों की है डालें कितनी कलियों की तरुणाई है . कल कल नदियों का निनाद और झरना कही पुकारे हैं  पल पल रंग बदलते मौसम कितने प्यारे प्यारे हैं ये धरती कितनी प्यारी है कितने खूब नजारे हैं . शस्यश्यामला धरती पर है नवजीवन संचार कहीं कही धधकती ज्वालाऐ है बियावान झंझाड कहीं कहीं दूर तक हिमनद फैले सागर खारे खारे हैं पल पल रंग बदलते मौसम कितने प्यारे प्यारे हैं ये धरती कितनी प्यारी है कितने खूब नजारे हैं कही...

मेरी माँल यात्रा 2

#माँलयात्रा २ हमारे सामने सामने जमान् हाईटैक हो गया . अब इसके साथ ना चले तो भुस्स कहलाते हैं और साथ चलनें में भयंकर आफत हुई . कल बेटी ने कहा मौल घुमा लाओ पिक्चर देखेगे . सच कहूं तो ये मौल होल को सोचकर ही मेरी ख्वारपीड हो जाती है . हमने गांव के ग्वैट में चलना सीखा ठैरा .. ताल खेत से माल खेत फटक मार कर जाने वाले हुए . वहां घुर्र वाली सीडियां .. अल्जी कर घुरीने का डर . फर्श ऐसा चुपड होता है जैसे हमारे चौमास में हमारे पहाड के बाट हो जाते हैं . चप्पल ज्वाते रडने का डर . ऐसे चलना पडता है जैसे नई नई ब्वारी नौले में पाणी भरने जाती है .  कदम रडे और आदमी रडा घ्वास्सस्स ... खैर मेरी पहली माल यात्रा आप फेसबुक में तीन चार साल पहले पढ चुके होंगे .. आज की ये दूसरी यात्रा थी . पिक्चर हौल के गेट पर तलासी देनी ठैरी .  खाने पीने का सामान झोला झमटी सब जाम करने वाले हुए .. भीतर एक भूटे हुए घ्वागे का पैकेट एक सौ सत्तर का ठैरा .. सब चीजें इतनी महंगी कि आप सपरिवार गये हों और सबने एक एक चीज भी खाई तो म्हैण भर का राशन साफ .. पिक्चर हौल मान्तर मस्त था .. भीतर ठन्डी ठन्डी बांजाणि की जैसी हवा चल रही...