दिखावे की आजादी

सुना था जब बीबी मायके जाती है तो शादी शुदा आदमी को आजादी मिलती है .हालांकि पुराणों में ये भी लिखा है कि जो शादीशुदा है वो आदमी ही कहां . पर यहां आदमी ही लिखा जायेगा .
ना जाने कितने कवियों ने इस अल्पकालिक आजादी पर कविताऐ लिखी . लेखकों ने लेख लिखे . साल भर इन्तजार रहता है इस घड़ी का .
मैं भी जब बीबी को मायके छोड़कर आया तो मारे खुशी के पागल था . दो चार घण्टे तो आजादी के इस महोत्सव को मनाने के तरीकों पर ही सोचता रहा .
अब तो मेरा राज था . आराम से सुबह उठा जायेगा . नहाने का मूड हुवा तो नहाया नही हुवा तो नही नहाया . जो मरजी खाओ .. पीओ .. कोइ रोक टोक नहीं .
पहला दिन तो आराम से बीता . सुबह दस बजे उठकर बाजार जाकर चाय नाश्ता किया . दिन का खाना . रात का खाना सब होटल से आया .पर यह क्या गांधीजी का पांच सौ रुपये का फोटो जेब से बिदाइ ले चुका था . अब अगले दिन से खुद अपना हाथ जगन्नाथ करने की ठानी . आखिर मर्द क्या नहीं कर सकता ? आज का पुरुष नारी से किसी मायने में कम नहीं . सिर के केश बिन्यास को ही लीजिये गौर से देखना पड़ता है नारी है कि नर .
मैने भी घर गृहस्थी के कामों में दक्षता दिखाकर पत्नी की बराबरी करनी की ठानी .
सुबह उठकर सफाई का बीड़ा उठाने की सोची . झाड़ू लगाने तक तो ठीक ठाक रहा . पोछा लगाने के लिये फर्श पर ज्यों ही पानी डाला अनुभवहीनता के कारण पानी ज्यादा पड़ गया . पानी पलंग के नीचे घुसकर कुछ गड़बड़ करता मैने पानी की तरफ लपककर पानी को वाइपर से कन्ट्रोल करने की सोची . ज्योंही लपका पानी में फिसलकर चारों खाने चित हो गया .मुह हाथ ढोडी पर कुछ नीले रंग के लैण्डमार्क बन चुके थे . कमर पर जो चोट लगी उससे कमर का कमरा बन गया . किसी तरह उठकर दर्द को पीने की कोशिस की . सफाई से तौबा करने में ही भलाई समझी . मन को समझाया कि ये महिलाओं का काम हैं . दर्द पर दवाई लगाने के लिये अलमारी खोली और दवाई लगायी और पेन किलर खा ली . दस मिनट ही बीते थे कि पेट में मरोड़ चालू हो गयी . दवाइ के पत्ते को गौर से देखा तो मालूम पड़ा कि मैं पेनकिलर की जगह जल्दी में जुलाब की गोलियां गटक गया .आधे घण्टे में ही दस बारह बार जा चुका था . मेरी हालत चुनाव हारे नेता की तरह खस्ता हो गयी थी .
बची खुची शक्ति जुटाकर किचन में चाय बनाने की सोची . पानी दूध चायपत्ती कितनी डालनी है ये पता न था . फिर भी स्वबिवेकानुसार चाय तैयार कर चुका था . कप में छानने बैठा तो तब पता चला मैं अपने अकेले के लिये लगभग चार कप चाय बना चुका था .
यहां तक भी मामला संभल जाता पर हद तब हो गयी जब चाय की पहली चुस्की में पता चला कि मैने चाय में चीनी की जगह नमक डाल दिया है .
मन की तसल्ली दी कि चलो कोइ बात नहीं अनुभव ही आदमी को सिखाता है .
अब दोपहर का खाना बनाने की बारी थी .यहां तो मेरे कारनामों ने ओर भी हाहाकार मचा दिया . चावल रसदार बन गये तो दाल बिलकुल हलवे जैसी . रोटी अफगानिस्तान का नक्शा थी तो कोइ आष्ट्रेलिया का .
रोटी बनाने के क्रम में अंगुलियों में जलकर जो फफोले बने उनका कहना ही क्या .
आधे दिन में ही मुझे नारी शक्ति की महानता का अंदाजा हो गया .
ऐसी दर्दनाक आजादी से बीबी की गुलामी ही मनभावन लगने लगी . लेटे लेटे गुलामी के ठाट याद आने लगे थे . सुबह की बेड टी . नाश्ते में गरमागरम पराठे . दोपहर का स्वादिष्ट खाना . सोचते सोचते कब आँख लगी पता ही नहीं चला .फोन की घण्टी पर आंख खुली तो देखा श्रीमती जी का फोन था . हालचाल पूछने के बाद जब उन्होने पूछा खाना खा लिया तो मैने कहां हां हां खुद बनाकर खाया .. बड़ा स्वाद बना था . मर्द को कुछ बड़प्पन तो आखिर दिखाना ही था .
श्रीमती जी ने खुश होकर कहा . तब तो ठीक है . मुझे आपके खाने की चिन्ता हो रही थी . अब आप बना ही रहे हो तो मेरी चिन्ता खतम हो गयी है . अब मैं एक दो हफ्ते और आराम से यहीं रहूंगी .

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