हमारे जमाने का वैलेन्टाइन

अच्छा ही है साब ये वैलेन्टाइन डे हमारे पहाड में नही होता था या यूं कह लो हमारे टैम पर नही है . आजकल तो श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह की तरह श्री प्रेम वत सप्ताह चल पडा है गोया प्यार न हुवा नीबू हो गया कि एक ही हफ्ते निचोडो ..
ऐसा नही कि हमारे टैम पर प्यार नही होता था या हमारे पास दिल नही था .. या हमने स्कूल के बाटों में लफंडरगिरी का प्रदर्शन न किया हो .. हम भी प्यार करते थे . पर हमारा प्यार राजकुमार कोहली की फिल्मों की तरह मल्टीस्टारर था . हम जूनियर हाईस्कूल जाने वाली परुली के दीवाने थे तो हाईस्कूल जाने वाली हरुली पर भी फिदा थे . पडौस के गांव की खिमुली की दंतपाटि के आशिक थे तो एक बाबकट बालों वाली प्राइमरी की मैडम को भी निहारते थे . कभी ब्या बरयात में बरेति गये तो हर बारात में एक नई लडकी की छवि आंखों में बसाकर ले आते और भगवान से कामना करते कि किसी और की बारात उसी गांव में दोबारा जाये और दोबारा उसी का दीदार हो . कभी अल्मोडा बागेश्वर गये तो बाजार दुकानों को कम देखते शहर की साफ सुथरी लडकियों को पीछे तब तक पलट पलट कर देखते जब तक किसी गटर के टूटे ढक्कन में ना लोटी जाते या बागेश्वर में जागनाथ जी के नन्दी के गोबर में न रड जाते . या बाबू जब तक ना मैक्याते .. कहां देखकर चल रहा है कुकरिच्याले .. बैचाल कहीं का .. मैंस नहीं देखे हैं क्या .. अब बाबू को कौन समझाये कि बेटा जामनै बटी कामन है . लडकिया देख रहा है . कहने का मतलब ये है कि यत्र तत्र सर्वत्र  हमारी निगाहें लडकियां ही देखती रहती बिलकुल अर्जुन की आंख की तरह .. हमें लगता लडकियां ही घट घट में व्याप्त हैं . ये बात अलग है कि लडकियां हमें बिलकुल नही देखती . वैसे भी हम अपनी औकात के बाहर की सुन्दर सुन्दर सुन्दरियां देखते . अब हम फटीचर हैं ये दुनिया को दिखता था पर हमारा दिल था कि ये सोचना भी गंवारा नही करता .
कहने का मतलब ये कि हमारे लिए हर घडी हर पल वेलेन्टाइन था . हम ये हफ्तेबाजी को न मानते ना उ बखत था .
कभी सोचता हूं कि पहाड में तब वेलेन्टाइन होता तो ... तब तो ना चौकलेट थी . ना टेडी था .. हगडे  तो हो ही नही सकता था ... हगते तो गध्यार जाकर एक उंचे ढूंग में थे .  तब अगर होता तो .. मूमफलि डे , बिलेमिठ्ठै डे , जलेबि डे ,होता .. किस डे का क्या होता ... हां ... सोचना भी मत .. ये तो उस जमाने में ब्याह किये लोगों में वर्जित था .. अगर पति पत्नी कही हंसकर बात कर रहे हों किसी ने देख लिया तो वह ओछ्याट कहलाता था .. छि: कतु बेशरम स्यैणि छ .. .. तो किस डे , विस डे तो जघन्यतम अपराध ही होता .
अच्छा तब हममें एक बात और थी .. हम निहारने तक ही सीमित थे . कभी  शादी ब्याह करने  की कल्पना न थी . ब्याह तो बाबू की कराते हैं ये शाश्वत नियम था .
प्रपोज करने की ना हिम्मत थी ना ही चलन .. हमारा काम आँखें सेकना सपने देखना ,और उसके ब्या में काम निभाना , और बाद में उनके बच्चों के मुंह से मामा सुनना था .
हां अगर कभी अनहोनी हो गयी .. दिल बगावत कर बैठा , या लडकी ने खुद प्रपोज कर दिया तो ... वैसे ये अनहोनी लाखों में एक के साथ ही होती थी .. तब कुछ हम अलग ही गैसेक्सी में चले जाते .. बिना धोये बालों पर तेल चुपड कर कंधी जेब में रखकर निकलते . आँखों में नीला या हरा चश्मा . . जो आजकल आप टेडी देते हो ना .. तब हम रूमाल दिया करते थे .. और वो हमारे लिए मेले से मुनडी ( अंगूठी ) लाती ... ये प्रेम की पराकाष्ठा थी ... हालांकि इन सबके बाद भी मामा ही बनना होता था .
एक बात और अगर प्रेम में हम कभी पकडे भी जाते तो आज की लडकी का भाई या बाप नही मारता था .. उनका काम तो हमारे पिताजी तक हमारी शिकायत पहुंचाना होता था ... उसके बाद कुटाई हमारे बाप के हाथों ही होती थी और गांव मोहल्ले में सभ्य लोग हमारी कुटाई का आँखों आखों देखा हाल वायरल करते थे ..
बाई दी वे ... आज के वेलेन्टाइन युग में मेरी हरुलियो , परुलियो , और भी गुमनाम प्यारो .. हैप्पी वेलनटाइन .. कभी सपनों में आ गया मैं तो .. ठीक वैसे ही मैक्याना ... जैसे स्कूल टैम में मैक्याती थी - रनकारा तेर बरमान फोड दयूल ... आपुणि बैणि छै कये तौ वेलेन्टाइन .. .. घर जैबेर तेरि घात कूल ... नंग रनौ रनकौर ...
#विनोदपन्त #खन्तोली

Comments

Popular posts from this blog

टमाटर प्याज

पहाडि होटल

अपुड्याट