फटी पेन्ट

फैशन भी फैशन ही ठैरा साहब . कब नया फैशन आ जाय कैसा आ जाय पता ही नही चलता . मेरे को ये नही पता चल पाया कि फैशन आता कहां से हैं . अचानक से हमारे सामने आकर खडा हो जाता है फैशन .
अब पैन्ट ही को ले लो . जब से मैने होश संभाला तब से बैलबाटम . चुस्त , बैगी , नैरौ पता नही क्या क्या आ गये . और आये ही जा रहे हैं . आजकल तो लडके नई नई फैशन की पेन्ट फटाफट बना लेते हैं . पर हमारे लिए तो साल में दो जोडी पेन्ट बन गयी तो बहुत हुवा . और रही फैशन की बात तो बापू जहां जिस टेलर के पास ले गये उसी से सिलवानी ठैरी . मेरा खानदानी दर्जी तो पेन्ट ऐसी सिलता था कि पता ही नहीं चलता था कि पेन्ट है  पायजामा . प्रैस भी किसके बाप की .. एक बार टेलर ने करके दे दी फिर दोबारा कभी नहीं करनी हुई . एक खास बात और थी . नई पैन्ट तुरन्त पहनने की इजाजत भी नहीं थी . नई पैन्ट आने जाने वाली कहलाती थी ये अलग बात थी कि हम कभी कहीं आते जाते भीनहीं थे . कभी आस पास किसी गांव में रिश्तेदारी में चले गये . तो पिताजी कहते यहा के लिए नयां क्या पहनना . रास्ते में धूल मिट्टी में खराब कर देगा . साल भर बाद जब कपडे बक्से से निकालर सुखाने का नम्बर आता तो तब तक पैन्ट एक बालिश्त छोटी हो चुकी होती थी या यूं कहिये हम एक बालिश्त बढ चुके होते थे . अब वह छोटी हो चुकी पैन्ट हमें पहना दी जाती और बक्से में रखने के लिए नई पैन्ट सिलाई जाती .
हम छोटी हो चुकी पैन्ट में भी फूले नहीं समाते और निकल पडते रैम्प पर फैशन परेड करने . ये रैम्प होता था पहाडी खेतों के इचाव कनाव . मतलब सीढीदार खेत  . जिसमें हम दोस्तों के साथ फिसलपट्टी खेलते . एक तो साल भर पुराना कपडा दूसरा खुरदरी फिसलपट्टी . पैन्ट के पिछवाडे में दो मोटे छेद हो जाते और हमारे भेल उन छेदों से बाहरी दुनिया के दर्शन करने लगते .
अब घर जाकर बाप की मार का डर होता और हम चुपचाप घर जाकर पूरी दुनियां की शराफत ओढे पढने बैठ जाते . पर पिताजी भी हमारे बाप यूं हीं नही थे . हमारी नस नस से वाकिफ  . फिर पिताजी किसी त्रिकालदर्शी ज्योतिश की तरह सटीक भविष्यवाणी कर देते - क्यों रे फाड लाया कपडे . हम मुंह से नही कहते पर दोनो हाथ बिके हुए गवाहों की तरह हमारे पीछे पेन्ट के छेद ढकने की नाकाम कोशिस करते . पिताजी हमारे गाल पर दो चार तमाचे रसीद करके नई पेन्ट को तुरन्त हमें न पहनने देने के अपने निर्णय की व्याख्या कुछ यूं करते - बताओ नई पैन्ट कौन देना ऐसे दुष्टों को . एक दिन हुवा नहीं नई पैन्ट फाड कर ले आया . फिर एक दो डायलाग के बाद एकाद थप्पड घूंसा पडता ही रहता .  आज में सोचता हूं कि पिताजी की मार के बाद हमारी आत्मा ने तब शायद पैन्ट को श्राप दिया होगा कि - जिस फटी पैन्ट के कारण मुझे इतनी मार पडी वही पैन्ट का फटना एक दिन फैशन कहलाएगा . भारत का हर नौजवान इसे गर्व से पहनेगा . तब शायद पैन्ट ने कहा हो कि इतना कठोर शाँप न दें .. यह तो कुछ अश्लील न हो जाय . मेरी आत्मा ने कहा होगा कि अब मैं अपना श्राप वापस तो नहीं ले सकता पर तुझे ये वरदान देता हू् कि पैन्ट हमारी तरह पीछे न फटकर आगे की तरफ घुटनों वगैरह में फटेगी . मेरा दिल तथास्तु कहकर फिर रोने में व्यस्त हो जाता  इतने में मां का दिल पसीज जाता वो मेरी तरफ से पिताजी से बहस करती और फटाफट एक पुराना कपडा लाकर हमारे पैन्ट में टल्ली लगा देती . यहां पर भी गौर करने वाली बात ये थी कि कभी कभी खाकी रंग की पैन्ट में लाल रंग की टल्टी हरे धागे से सिली होती थी . मां की हिदायत के बाद भी हम एकाद दिन बाद दोबारा फिसलपट्टी में फिर जाकर पैन्ट में छेदों का आकार बढाकर पहुंच जाते . माँ फिर टल्ली के उपर टल्टी लगा देती . ये अंतहीन सिलसिला चलता ही रहता .
आज पैन्ट का फैशन देखता हूं तो लगता है कि शायद मेरा श्राप सच हो गया . अब फटी पैन्ट का भी फैशन है और एक नया ट्रैन्ड चला है बालिश्त भर छोटी पैन्ट .. मानो हमारा युवा खेत में रोपाई लगाने जा रहा हो .
कुछ भी कह लो - फैशन जिन्दाबाद था जिन्दाबाद है और जिन्दाबाद रहेगा ..  इस डायलाग के बाद मैं सन्नी देओल की तरह हैन्डपम्प उखाडने जा रहा हूं .. आप नये फैशन का स्वागत करते रहो

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