मेरी माँल यात्रा

बच्चों की जिद पर मॉल गया हो साब ... क्याप बना ठैरा . हमारा तो पूरा गाँव समा जाय. दरवाजे पर ही गड़बड़ हो गयी भीतर कै खुलैगे या भ्यैरकै गजबजी गया . भीतर जाकर देखा बड़ा ही चुपड़ फर्श ठैरा . रड़ते रड़ते बचा ... मैलि मंजिल मे जाने के लिये घूमने वाली सीड़ी .. आब कसके जाऊ ? बेटा मेरी हालत समझकर बोला पापा मेरा हाथ पकड़ो कुछ नही होगा ... फटक मार कर चढा ...पता नही कैसे भगवान की कृपा से बैलैन्स बन गया वरना मुख लै पतेड़ी जाता ..... खुटन में कम्ब जैसी छूट गयी ...
बाहाहो गजब महंगाई ठैरी अन्दर ... नाम हुवा पैन्टागन माँल पर मेरे लिये पैन्ट गीली माँल हो गया ...
बजर पड़ जाल इनसे अच्छी तो भोटिया मार्केट की दुकानें ठहरी ..... कुकुरीच्याले सर सर बोलकर पन्नी के डबल भी काट लेने वाले हुए .. भ्यैर निकलते समय खान तलासी भी दो जैसे हम जेब काटकर आये हैं ......
कसम से ईज्जत के साथ फुल बेईज्जती का अहसास होता है ..

Comments

Popular posts from this blog

टमाटर प्याज

पहाडि होटल

अपुड्याट