शहर यात्रा

आज तो जमाना बदल गया है . मैं जब बच्चा था तो गां व के बच्चे सीधेसाधे ही होते थे .पाचवी तक तो गाँव से बाहर ही नहीं गया था . शहर के बारे में बस सुना ही था . शहर भी तब मेरे लिये अल्मोड़ा बागेश्वर नैनीताल तक ही था .
खैर पहली बार पाँचवी छठी में पढता हूंगा तो पिताजी के साथ अल्मोंडा जाने का अवसर मिला . बस में भी पहली बार ही बैठा था तब . बस के अन्दर जाने पर ही पता चला कि बस में कुर्सियां ( सीट )भी होती है . मैं अपनी ताईजी के साथ ज्यादा रहता था .सारी जिग्यासाओं की पूर्ति वही किया करती थी .
पहली बार शहर जाने का रोमांच चरम पर था . तब कपड़े भी एक दो जोड़ी थे . लोगों के पास इस्त्री थी तो मैने किसी से सुनकर रात तीन चार दिन से पैन्ट शर्ट तह बनाकर सिराहने रखी ताकि सिकुड़न दूर हो जाय . पर तह बनाने का कोइ तरीका नहीं था तो जब कपड़े निकाले उन पर कयी वर्गाकार क्रीज बन गयी . जिन्हें देखकर मैं फूला नहीं समा रहा था . जाने से पहले ताइजी ने शहर के बारे में अपनी समझ के अनुसार बातें बताई . शहर के कायदे कानून सिखाये . मसलन गाड़ी में जीभ बाहर मत निकालना .. जीभ कटने का डर है . गाड़ी से सिर बाहर मत निकालना .और जो सबसे महत्वपूर्ण सलाह दी वो थी - किसी के घर जायेगा तो जो भी खाने की चीज नमकीन वगैरह आयेगी उसे पूरा मत खाना वरना लोग मजाक करेगे सोचेगे भुख्खड़ है .
और भी बातें बताई . चम्मच से खाना . .
अब में चला पिताजी के साथ शहर . पहले तो गाड़ी देखकर चमत्कृत था . बस चलने लगी तो उबड़ खाबड़ रास्तों में बस हिचकोले खाने लगी तो ताईजी की बात याद आ गयी .डर गया कहीं जीभ दांतों के बीच ना आ जाय झटके खाने से .. पिताजी कोइ भी बात पूछें मैं इशारे में जवाब देने लगा . बोलने में भी जीभ दांतों के बीच आ जाये तो ..
अल्मोड़ा जाकर खूब दुकानें पक्ति से .. बड़े बड़े घर .. मेरे लिये नयी दुनियां थी .
बहां जाकर जब तक चचेरी बहन के यहां रुके सामान्य था सब कुछ .
एक दिन पिताजी अपने मित्र के यहां लेकर गये .. वहां मेरा हमउम्र एक लड़का भी था .. पिताजी किसी काम से अपने मित्र के साथ बाजार चले गये . दोपहर का समय था .. मेरे लिये खाना आ गया . खाने की थाली में दाल चावल रोटी सब्जी खीरे का सलाद था ..
थाली देखकर बिचलित हो गया .. मेरे लिये जो बातें अनहोनी थी वो थी .. दाल का कटोरी में आना .. घर पर तो चावलों के उपर डाल दी जाती थी .. दोपहर के खाने में रोटी मिलना .. खाने के साथ खीरा मिलना.. पहाड़ में तो खीरा धनिये का नमक लगा कर फल की तरह वैसे ही खाया जाता था .
पर जो भीषणतम समस्या मेरे सामने थी चम्मच से कैसे खाऊ ? और थाली में क्या क्या खाऊ ?
मैने खाना खाने से ही इन्कार कर दिया ..मेजवान ने सोचा बच्चा शायद साथ में खा ले .अपने बच्चे को पास बिठा दिया .. उसके देखा देखी मैं भी खाने लगा .
दो रोटियाँ थी एक खाने के बाद याद आया पूरा नहीं खाना है वरना भुख्खड़ घोषित हो जाउगा .. डेढ रोटी के बाद रोटी बचा दी .. अब चावल खाने के लिये चम्मच उठा ली .. खाना प्लेट में था .. बडी मुश्किल से दाल चावल मिलाकर चम्मच में चावल लेने लगा तो आदत ना होने के कारण चम्मच में चावल आने मुश्किल हो गये .. एक कोने से दूसरे कोने वापस उसी जगह . चावलों को पूरी प्लेट में यात्रा करा दी पर चावल थे कि चम्मच मे आने को तैयार न थे .. बड़ी मुश्किल से दो चार दाने करके खाने लगा .. प्लेट के चारों ओर बिखरे चावलों का बृत्ताकार घेरा बन चुका था .एक दो चम्मच खाना बुशशर्ट मैं भी गिर गया था .. सात आठ चम्मच चावल खाने में ही पसीने से तर बतर हो गया ..नाक बहने लगी .. कुल मिलाकर मेरी हालत दर्शनीय थी .
मैने इन बिपरीत परिस्थितियों में भी सभ्यता दिखाने की गरज से चावल भी बचा दिये .. मैं भुख्खड़ किसी कीमत पर साबित नहीं होना चाहता था .. ताईजी की सलाह का मैने यही तो मतलब निकाला था ..हालाकि वो सलाह नमकीन बिस्किट के सन्दर्भ में थी ..
ऐसा शानदार लंच करने के बाद मैने भविष्य में किसी के यहां भी खाना न खाने के प्रण के साथ मेजवान के घर से विदा ली .

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