डोई पाण्डे ज्यू क ब्या
जैसा कि आप जानते ही हो हमारे डोई पाण्डे ज्यू हर साल लखनऊ से पहाड़ आते हैं अपनी फटफटिया पर . कहने को तो ये यात्रा पहाड़ घूमने के नाम पर होती है लेकिन असलियत ये है कि हमारे डोई जी पहाड़ एक लड़की ढूंढने आते हैं . इस साल भी आये थे ये जनाब . कुछ लड़कियों के इन्टरब्यू भी लिए . पेश है उनके साक्षातकार के मुख्य अंश -
पहली लड़की देखने रानीखेत गये . लड़की प्राइमरी में शिक्षिका थी . डोइ जी ने लड़की को देखा तो मन आ गयी . डोई कुछ पूछते उससे पहले लड़की बोली - ये बताओ लखनउ में तुमारा घर कहां ठैरा ?
डोई - कल्याणपुर ..
लड़की - ये दुर्गम ठैरा या सुगम ..
डोई - क्या मतलब ये सुगम दुर्गम क्या होता है .
लड़की - देखो जी मैं मास्टरनी हूं . हमारी पोस्टिग दुर्गम सुगम में होती है . फिलहाल में एक दुर्गम स्कूल में हूं . अब में नहीं चाहती कि मेरी ससुराल दुर्गम में हो . अगर तुम्हारा घर स्टेशन के पास ही हो तो ठीक है . अगर स्टेशन से दूर हुवा तो दुर्गम में मैं नहीं जाउगी . तुम्हें एक घर सुगम में लेना पड़ेगा .
डोई बेचारा चकरा गया .. बजर पड़ जाल यो दुरगम सुगम .. डोइ वहां से भाज गया ..
अब एक जगह लड़की देखने गया .. लड़की बैंक में थी .
बातों का सिलसिला चला तो लड़की ने साफ कह दिया - तुम्हारे साथ ब्या तभी करूंगी जब तुम अपना जन धन खाता .. अटल पेशन योजना .. प्रधानमन्तरी बीमा योजना का खाता मेरे बैंक में खोलोगे ..
डोई ने मन ही कहा आग लाग जौ त्यार बैंक .. यां अपने बैंक का टारगेट पूरा करना मुश्किल हो रहा है .. सोच के बताउगा कहकर डोई ने वहां से फूटने में भलाई समझी ..
अब डोई आगे बढा .. एक लड़की गांव से उपर रोड साइड एक कस्बे में रहती थी . डोइ ने लड़की देखी - गोरी फनार लड़की ठैरी .. डोई तो चाइयैं रह गया लड़की को .. बोला तुमर नाम कि छ ? कतु तक पढाई कर राखी ?
लड़की - कमुली ठैरा मेरा नाम .. हाइस्कूल में तीन नम्बर से थर्ड डिबिजन रुक गयी ठैरी अलबेर .. बोर्ड का सैन्टर रनकारों ने कथप दूसरे ईसकूल में बना दिया ठैरा ... बाबारे . बिलकुल भी नकल नही हो रही ठैरी वहां .. गजबजाट जैसा हो गया .. फिर सारे सवाल कोर्स से भ्यैर के ठैरे .. लेख तो अच्छा बनाया ठैरा मैने .. पर नम्बर ही नहीं दिये ...ओइज्या तुम तो चाहा पी ही नहीं रहे .. पी लो नहीं तो टौणी जाएगी ..
डोई - किलै पहाड़ी बुलाण नि उन तुमनकैं ...?
लड़की - समझ जाने वाली ठैरी .. पर बोलना नहीं आने वाला ठैरा .. मैं तो नानछना बटी यहीं रही ठैरी .. गांव तो अप्पर पास करने तक ही रहे ठैरे .. अब वहां जाना कम ही होने हुवा हुवा .. हर इतवार चले गये तो चले गये .. क्या ठैरा गांव में ...
डोई - घरक काम करण और पहाड़ी खाण बड़ूण तो उने हुनेल तुमन .. जसि मडुव रोट .. भटक चुरकाणि .. भटिया ..वगैरह ..
लड़की - ना हो .. नी आता ये बनाना .. एक बार ईजा ने बनाया था मडुवे का रोटा ओर भटिया .. देखकर ही वाक्क जैसी हो जाने वाली हुई .. ब्या के बाद तो लखनऊ ही रहना ठैरा तुम्हारे साथ .. फिर ये भटिया वटिया सीखकर क्या करना ठैरा ..
डोई महाराज ने मन ही मन कहा बाबाहो .. कहां फस गया यार .. और ब्या का खयाल मन से निकालकर स्कूटर को किक मारने लगा ...
अब तो अगले साल ही देखी जाऐगी बल ...
पहली लड़की देखने रानीखेत गये . लड़की प्राइमरी में शिक्षिका थी . डोइ जी ने लड़की को देखा तो मन आ गयी . डोई कुछ पूछते उससे पहले लड़की बोली - ये बताओ लखनउ में तुमारा घर कहां ठैरा ?
डोई - कल्याणपुर ..
लड़की - ये दुर्गम ठैरा या सुगम ..
डोई - क्या मतलब ये सुगम दुर्गम क्या होता है .
लड़की - देखो जी मैं मास्टरनी हूं . हमारी पोस्टिग दुर्गम सुगम में होती है . फिलहाल में एक दुर्गम स्कूल में हूं . अब में नहीं चाहती कि मेरी ससुराल दुर्गम में हो . अगर तुम्हारा घर स्टेशन के पास ही हो तो ठीक है . अगर स्टेशन से दूर हुवा तो दुर्गम में मैं नहीं जाउगी . तुम्हें एक घर सुगम में लेना पड़ेगा .
डोई बेचारा चकरा गया .. बजर पड़ जाल यो दुरगम सुगम .. डोइ वहां से भाज गया ..
अब एक जगह लड़की देखने गया .. लड़की बैंक में थी .
बातों का सिलसिला चला तो लड़की ने साफ कह दिया - तुम्हारे साथ ब्या तभी करूंगी जब तुम अपना जन धन खाता .. अटल पेशन योजना .. प्रधानमन्तरी बीमा योजना का खाता मेरे बैंक में खोलोगे ..
डोई ने मन ही कहा आग लाग जौ त्यार बैंक .. यां अपने बैंक का टारगेट पूरा करना मुश्किल हो रहा है .. सोच के बताउगा कहकर डोई ने वहां से फूटने में भलाई समझी ..
अब डोई आगे बढा .. एक लड़की गांव से उपर रोड साइड एक कस्बे में रहती थी . डोइ ने लड़की देखी - गोरी फनार लड़की ठैरी .. डोई तो चाइयैं रह गया लड़की को .. बोला तुमर नाम कि छ ? कतु तक पढाई कर राखी ?
लड़की - कमुली ठैरा मेरा नाम .. हाइस्कूल में तीन नम्बर से थर्ड डिबिजन रुक गयी ठैरी अलबेर .. बोर्ड का सैन्टर रनकारों ने कथप दूसरे ईसकूल में बना दिया ठैरा ... बाबारे . बिलकुल भी नकल नही हो रही ठैरी वहां .. गजबजाट जैसा हो गया .. फिर सारे सवाल कोर्स से भ्यैर के ठैरे .. लेख तो अच्छा बनाया ठैरा मैने .. पर नम्बर ही नहीं दिये ...ओइज्या तुम तो चाहा पी ही नहीं रहे .. पी लो नहीं तो टौणी जाएगी ..
डोई - किलै पहाड़ी बुलाण नि उन तुमनकैं ...?
लड़की - समझ जाने वाली ठैरी .. पर बोलना नहीं आने वाला ठैरा .. मैं तो नानछना बटी यहीं रही ठैरी .. गांव तो अप्पर पास करने तक ही रहे ठैरे .. अब वहां जाना कम ही होने हुवा हुवा .. हर इतवार चले गये तो चले गये .. क्या ठैरा गांव में ...
डोई - घरक काम करण और पहाड़ी खाण बड़ूण तो उने हुनेल तुमन .. जसि मडुव रोट .. भटक चुरकाणि .. भटिया ..वगैरह ..
लड़की - ना हो .. नी आता ये बनाना .. एक बार ईजा ने बनाया था मडुवे का रोटा ओर भटिया .. देखकर ही वाक्क जैसी हो जाने वाली हुई .. ब्या के बाद तो लखनऊ ही रहना ठैरा तुम्हारे साथ .. फिर ये भटिया वटिया सीखकर क्या करना ठैरा ..
डोई महाराज ने मन ही मन कहा बाबाहो .. कहां फस गया यार .. और ब्या का खयाल मन से निकालकर स्कूटर को किक मारने लगा ...
अब तो अगले साल ही देखी जाऐगी बल ...
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