पहाडी बर्यात
आपको आज मैं पहाड़ी बारात के एक दृश्य से रूबरू कराता हूं . मेरी उम्र तक के लोगों ने अक्सर ये दृश्य अवश्य देखा होगा और महसूस भी किया होगा कि तब हमारे ग्रामीण जीवन में कितनी आत्मीयता थी . दरअसल वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना तो हमारे गांवों में ही थी . तब गांव मैं आयी बारात की कौन कहे . सुना है कि गांव से गुजरती अनजान बारात के सत्कार के लिए भी लोग तत्पर हो जाते थे .
हमारे घर के कुछ दूर एक रास्ता पैदल पहले प्रचलन में था .. हम भी गांव को क्रास करती बारातों को देखने जाते थे . तब बारात के साथ एक परात में गुड लिये एक आदमी चलता था जो हमें गुड खिलाता था .हम गुड के लालच में बारात देखने जरूर जाते थे . एक चीज और जो आकर्षित करती थी वह थी बारात में चल रहे बीनबाजा तुरही वालों और छोलिया नर्तकों को देखना . बारात देखते दर्शकों के सामने थोडी देर के लिए ही सही ढोली छलरिया बाजा बजा देता और छलरिये नर्तक तलवार घुमा कर कुछ नाच कर ही देते थे . ईजा वगैरह डोली में बैठी दुलहन को देखते थे चाहे वह बारात कहीं की हो जानपहचान की भी ना हो ... थ्वाडै डोलि बिसाया हां ब्योलि देखनू .. ब्योलि महिलाओं को देखकर रोने लगती थी . ईजा लोग उसको चुप कराते थे . ईजा डाड नि मार आब्बै मैत जाली तेर भाई त्वकै बुलाणा लिजी आल .. और ब्योलि कभी कभी ईजा लोगों को अंगाव भी डाल देती थी .. ये दृश्य तब आम था .. आत्मीयता की मिसाल भी .. बारात चले जाने के बाद मैने ईजा को आंखों में आंसू लिये वापस आते देखा है . बालमन प्रश्न करता था ईजा ! तु किलै मारनछी डाड ..??? तब ईजा कहती थी चेला .. निश्वास लागडौ .. मैं फिर प्रश्न करता .. कैक निश्वास ईजा . ?? तौ बर्यात तो कांकी छ .. ब्योलि ले कोप छ ... तब ईजा कहती - तकैं देखिबेर मैतैकि याद उणैं
विनोद पन्त # Khantoli
हमारे घर के कुछ दूर एक रास्ता पैदल पहले प्रचलन में था .. हम भी गांव को क्रास करती बारातों को देखने जाते थे . तब बारात के साथ एक परात में गुड लिये एक आदमी चलता था जो हमें गुड खिलाता था .हम गुड के लालच में बारात देखने जरूर जाते थे . एक चीज और जो आकर्षित करती थी वह थी बारात में चल रहे बीनबाजा तुरही वालों और छोलिया नर्तकों को देखना . बारात देखते दर्शकों के सामने थोडी देर के लिए ही सही ढोली छलरिया बाजा बजा देता और छलरिये नर्तक तलवार घुमा कर कुछ नाच कर ही देते थे . ईजा वगैरह डोली में बैठी दुलहन को देखते थे चाहे वह बारात कहीं की हो जानपहचान की भी ना हो ... थ्वाडै डोलि बिसाया हां ब्योलि देखनू .. ब्योलि महिलाओं को देखकर रोने लगती थी . ईजा लोग उसको चुप कराते थे . ईजा डाड नि मार आब्बै मैत जाली तेर भाई त्वकै बुलाणा लिजी आल .. और ब्योलि कभी कभी ईजा लोगों को अंगाव भी डाल देती थी .. ये दृश्य तब आम था .. आत्मीयता की मिसाल भी .. बारात चले जाने के बाद मैने ईजा को आंखों में आंसू लिये वापस आते देखा है . बालमन प्रश्न करता था ईजा ! तु किलै मारनछी डाड ..??? तब ईजा कहती थी चेला .. निश्वास लागडौ .. मैं फिर प्रश्न करता .. कैक निश्वास ईजा . ?? तौ बर्यात तो कांकी छ .. ब्योलि ले कोप छ ... तब ईजा कहती - तकैं देखिबेर मैतैकि याद उणैं
विनोद पन्त # Khantoli
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