अपुड्याट
गोपाल सिंह - ओ पन्थ्याण ज्यू ... ओ पन्थ्याण ज्यू ...
आम् - हो ओ ओ ओ ....
गोपाल सिंह - ओ पन्थ्याण ज्यू पैलाग ..
आम-आशीर्वाद .कांक छा ..??
गोपाल सिंह- पार दबक गौं क छ्यू .. गोपाल सिंह ..
आम् कि- कूंछिया ..कां जाणी छिया
के नै हो पन्थ्याणि ज्यू . इथैके कति कुमिना क सुद्याव लागि रौछ्यू .. कैलि कौ तुमार यां छ कैबेर . तबै आयूं . ह्वलै तुमार यां कुमिन .. नानू ले देला जब हैजाल .
आम- होय क्यैने .. छ .. क्यै कि चैन पडौ तुमन कुमिन . कति पुज छ कि ?
गोपाल सिंह- नै पन्थ्याण ज्यू बौज्यू बीमार हैरान . के नै पचणौय . कैलि कौ कुमिन न साग दिओ कैबेर . तबै चैन हैरौ . छ जबत दि हालौ .
आम-
होय होय क्यै नै छ . अल्लै दयू हां .
गोपाल सिंह - होय पन्थ्याण ज्यू भल हैजौ तुमर . कतु छन नानतिन .
आम- तीन छन गोपाल सिंग (अं ) .. एक च्योल द्वि चेल्ली .
गोपाल सिंह- कां छ तुमर छ्यौड .. कि कनौं ..?
आम- दिल्ली पन छ .
गोपाल सिह- कि कनान तुमार छ्यौड. दिल्ली में . भली नौकरी में हुन्याल हाय .
आम- बस पेट पावण रौ गोपाल सिंग ज्यू आपुण . जि करनन्योल . आपुणै ले पेट पाव हाललौ मस्तु भोय .
गोपाल सिंह - हेय !
आम - तीन म्हैण हैगेईन चिठ्ठी ले नै ऐरैय .
गोपाल सिह- ऐ जालि पन्थ्याण ज्यू . फिकर नै करो .
आम- कि करू गोपाल सिंग ज्यू . अत्ति फिकर हैरै . तस्यान नानतिन भोय .
गोपाल सिंह - हेय कुड.यूं पैं . तुम मतारि भया . क्यै नि होलि फिकर .
(आमा क आँखन बटी आंसनक तौडाट )
गोपाल सिंह - अलाओ नै पन्थ्याण ज्यू . आबै ऐ जाल . देपाताक थान में द्यू जगै दिया .
आम- होय गोपाल सिंह ज्यू . ईष्टकै सहार भोय
गोपाल सिंह - छ्योडी कां छन तुमार ?
आम् - बेवै हालन द्विय्ये . ठुलि पिठोरगढ छ नानि वालि राणीखेत .
गोपाल सिंह - कि कनान् जरैं .
आम - ठुल जवैं पी डबल्लू में छन बल . नान् वाल मास्टर छन .
गोपाल सिंह - भलो भेय . बचि रई चैं तुमैरि चेलि जरेंनैंकि ज्वडि ..
आम - होय गोपाल सिंग ज्यू . आब कति च्योल रनकारौक खुट अलज्यी जांछीयो है जांछीं . आब हम बुड बाडी जै कतु बचुल . यो कारबार समावणी भली ब्वारि ऐ जांछीं हम आफि मरना फिर सुकैलि .
गोपाल सिंह - दै .. तस क्यै कूंछा पन्थ्याण ज्यू .. आजि नाति नातिण नि देखला .. अल्लै बै तसि भाग् क्यै बलाछा .
आम- ओं गोपाल सिंग ज्यू .. आपुण हात में ज कि छ . जी भगवानै सोचि राखि हुन्योल .
गोपाल सिंह - भलै ह्वल तुमार . परोपकारि मौ भेय तुमैरि . तुमार जै भल नि ह्वलौ कैक ह्वल . नाम् भेय पौंणज्यूनाक इलाक मकै .
आम- सब तुमौरे आशीर्वाद छ गोपाल सिंग ज्यू .
गोपाल सिंह - तस क्यै कूंछा हो . भलाई करी तौ तुमैरि भेय .
आम - चहा बणू तुमैरि तैं .?
गोपाल सिंह - नै पन्थ्याण ज्यू . न्है जां ऐल . टाड. जांण भेय . फिर जैबेर भैंस ले हत्यूण छ . ब्वारि मैत जैरै नवान छ वां . बुडी ले ऐकली छ घरपन .
आम - लिओ पैं कुमिन धरो यो झ्वालन .
गोपाल सिंग - पन्थ्याण ज्यू डबल कतु भ्याय यैक .
आम- ओईज्या .. कस फसक करनौछा .. तैक डबल हुननै .. हद्द हैगे ..
गोपाल सिंह - कदिनै पौंणज्यू कैं लगै दिया पैं हमार यां .. और तो कि ल्हिजानान .. पौसेक ध्यू होलो कदिनै रोट चुपड खाला .. ठ्योक लिबेर ले आया बल . मणी दै क कांचि मांचि जस ले होलत ..
आम - होय गोपाल सिंग ज्यू आबै च्योल घर आलो तब लगून बुडज्यू कैं तुमार यां .
गोपाल सिंह - अच्छा पैं ऐल हिटू .. तुमर छ्योड बची रौ . वीक खुटन कान् ले जन बुडौं .. वीक एकै एकैस पांचैकि पंचैस हैजो . तुमार परसाद म्यार बौज्यू यो कुमिन खाल ....
(दोस्तो ये कुछ साल पहले के पहाड़ी जीवन का एक अंश है . अपने यहां की ठेठ भाषा प्रयोग की है . जहां समझ न आये पूछ लीजिएगा .गौर से पढेंगे तो समझ आऐगा कि कितनी आत्मीयता होता है हमारे समाज में . निस्वार्थ सेवा भावना . और भी बहुत कुछ ... आप अपनी अपनी व्याख्या कर सकते हैं )
विनोद पन्त' खन्तोली '
कुमिन - भुज
कांचि - अधजमा कच्चा पक्का दही
सोद्याव - ढूंढ खोज .
आम् - हो ओ ओ ओ ....
गोपाल सिंह - ओ पन्थ्याण ज्यू पैलाग ..
आम-आशीर्वाद .कांक छा ..??
गोपाल सिंह- पार दबक गौं क छ्यू .. गोपाल सिंह ..
आम् कि- कूंछिया ..कां जाणी छिया
के नै हो पन्थ्याणि ज्यू . इथैके कति कुमिना क सुद्याव लागि रौछ्यू .. कैलि कौ तुमार यां छ कैबेर . तबै आयूं . ह्वलै तुमार यां कुमिन .. नानू ले देला जब हैजाल .
आम- होय क्यैने .. छ .. क्यै कि चैन पडौ तुमन कुमिन . कति पुज छ कि ?
गोपाल सिंह- नै पन्थ्याण ज्यू बौज्यू बीमार हैरान . के नै पचणौय . कैलि कौ कुमिन न साग दिओ कैबेर . तबै चैन हैरौ . छ जबत दि हालौ .
आम-
होय होय क्यै नै छ . अल्लै दयू हां .
गोपाल सिंह - होय पन्थ्याण ज्यू भल हैजौ तुमर . कतु छन नानतिन .
आम- तीन छन गोपाल सिंग (अं ) .. एक च्योल द्वि चेल्ली .
गोपाल सिंह- कां छ तुमर छ्यौड .. कि कनौं ..?
आम- दिल्ली पन छ .
गोपाल सिह- कि कनान तुमार छ्यौड. दिल्ली में . भली नौकरी में हुन्याल हाय .
आम- बस पेट पावण रौ गोपाल सिंग ज्यू आपुण . जि करनन्योल . आपुणै ले पेट पाव हाललौ मस्तु भोय .
गोपाल सिंह - हेय !
आम - तीन म्हैण हैगेईन चिठ्ठी ले नै ऐरैय .
गोपाल सिह- ऐ जालि पन्थ्याण ज्यू . फिकर नै करो .
आम- कि करू गोपाल सिंग ज्यू . अत्ति फिकर हैरै . तस्यान नानतिन भोय .
गोपाल सिंह - हेय कुड.यूं पैं . तुम मतारि भया . क्यै नि होलि फिकर .
(आमा क आँखन बटी आंसनक तौडाट )
गोपाल सिंह - अलाओ नै पन्थ्याण ज्यू . आबै ऐ जाल . देपाताक थान में द्यू जगै दिया .
आम- होय गोपाल सिंह ज्यू . ईष्टकै सहार भोय
गोपाल सिंह - छ्योडी कां छन तुमार ?
आम् - बेवै हालन द्विय्ये . ठुलि पिठोरगढ छ नानि वालि राणीखेत .
गोपाल सिंह - कि कनान् जरैं .
आम - ठुल जवैं पी डबल्लू में छन बल . नान् वाल मास्टर छन .
गोपाल सिंह - भलो भेय . बचि रई चैं तुमैरि चेलि जरेंनैंकि ज्वडि ..
आम - होय गोपाल सिंग ज्यू . आब कति च्योल रनकारौक खुट अलज्यी जांछीयो है जांछीं . आब हम बुड बाडी जै कतु बचुल . यो कारबार समावणी भली ब्वारि ऐ जांछीं हम आफि मरना फिर सुकैलि .
गोपाल सिंह - दै .. तस क्यै कूंछा पन्थ्याण ज्यू .. आजि नाति नातिण नि देखला .. अल्लै बै तसि भाग् क्यै बलाछा .
आम- ओं गोपाल सिंग ज्यू .. आपुण हात में ज कि छ . जी भगवानै सोचि राखि हुन्योल .
गोपाल सिंह - भलै ह्वल तुमार . परोपकारि मौ भेय तुमैरि . तुमार जै भल नि ह्वलौ कैक ह्वल . नाम् भेय पौंणज्यूनाक इलाक मकै .
आम- सब तुमौरे आशीर्वाद छ गोपाल सिंग ज्यू .
गोपाल सिंह - तस क्यै कूंछा हो . भलाई करी तौ तुमैरि भेय .
आम - चहा बणू तुमैरि तैं .?
गोपाल सिंह - नै पन्थ्याण ज्यू . न्है जां ऐल . टाड. जांण भेय . फिर जैबेर भैंस ले हत्यूण छ . ब्वारि मैत जैरै नवान छ वां . बुडी ले ऐकली छ घरपन .
आम - लिओ पैं कुमिन धरो यो झ्वालन .
गोपाल सिंग - पन्थ्याण ज्यू डबल कतु भ्याय यैक .
आम- ओईज्या .. कस फसक करनौछा .. तैक डबल हुननै .. हद्द हैगे ..
गोपाल सिंह - कदिनै पौंणज्यू कैं लगै दिया पैं हमार यां .. और तो कि ल्हिजानान .. पौसेक ध्यू होलो कदिनै रोट चुपड खाला .. ठ्योक लिबेर ले आया बल . मणी दै क कांचि मांचि जस ले होलत ..
आम - होय गोपाल सिंग ज्यू आबै च्योल घर आलो तब लगून बुडज्यू कैं तुमार यां .
गोपाल सिंह - अच्छा पैं ऐल हिटू .. तुमर छ्योड बची रौ . वीक खुटन कान् ले जन बुडौं .. वीक एकै एकैस पांचैकि पंचैस हैजो . तुमार परसाद म्यार बौज्यू यो कुमिन खाल ....
(दोस्तो ये कुछ साल पहले के पहाड़ी जीवन का एक अंश है . अपने यहां की ठेठ भाषा प्रयोग की है . जहां समझ न आये पूछ लीजिएगा .गौर से पढेंगे तो समझ आऐगा कि कितनी आत्मीयता होता है हमारे समाज में . निस्वार्थ सेवा भावना . और भी बहुत कुछ ... आप अपनी अपनी व्याख्या कर सकते हैं )
विनोद पन्त' खन्तोली '
कुमिन - भुज
कांचि - अधजमा कच्चा पक्का दही
सोद्याव - ढूंढ खोज .
Bhot sunder lekh chu kaka ,bilkul purani phadek yad dila de ... Amak dgad wali
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