उठो लाल
उठो लाल आगे को देखो
क्यों हारे थे इस पर सोचो .
चहूं ओर हरदा का डंका .
अपनों ने फिट कर दी लंका .
जो अपने थे संगी साथी
एक एक कर हो गये बागी
खुद को खुदा समझ बैठे अब
बैठ अकेले दाढी नोचो .
उठो लाल आगे को देखो
क्यों हारे थे इस पर सोचो .
कहां गये वो जगरी भगरी
क्यों ना औतर पाये डंगरी .
फिर से द्याप्तों को औतराओ
दोबारा से पूछ कराओ .
कैसा था वो इस्टिंग हरदा
जनता के पलडे में तोलो .
उठो लाल आगे को देखो
क्यों हारे थे इसपर सोचो .
रोडवेज की खच्चाडा में
बुडज्यू को जो सफर कराया .
मधुली आमा को पिनसिन दी
वो भी तेरे काम न आया .
दो हजार बाईस की खातिर
और नयी कुछ तिकडम सोचो .
उठो लाल आगे को देखो
क्यों हारे थे इसपर सोचो
गैरसैण में टैन्ट लगाकर
झूठे सपनों को दिखलाया .
केदारेश्वर का सब पैसा
सूफी गायक को भिजवाया .
कैसे हों आबाद पहाड़ी
कैसे रुके पलायन सोचो
उठो लाल आगे को देखो
क्यों हारे थे इसपर सोचो .
गांव गांव सब उजड रहे थे
फसल खा रहे सूअर बन्दर
लोगों को तुम दिखा रहे थे
गौलपार में खली का दंगल
पब्लिक को मत उल्लू समझो
जनता की तो नब्ज टटोलो
उठो लाल आगे को देखो
क्यों हारे थे इसपर सोचो .
( विनोद पन्त 'खन्तोली ' )
चुनाव हारने के बाद हमारे प्यारे हरदा आजकल आत्ममन्थन कर रहे हैं बल .. पिछले दिनो हरदा ने एक कविता जो आपने बचपन में पढी होगी उसकी टांग तोडने की कोशिस की थी बल .. हरदा ने चैलेन्ज दिया था पक्ष या विपक्ष में इस कविता को लिखने की . लो जी मैने लिख मारी ..कोई इस कविता को हरदा तक पहुचा देना हो . पक्ष या विपक्ष हरदा खुद तय कर लें .. और हां पांच हजार भी भिजवा देना बल हो . बीडि सलाई का भी खरचा चल जाय तो बहुत ठैरा -
क्यों हारे थे इस पर सोचो .
चहूं ओर हरदा का डंका .
अपनों ने फिट कर दी लंका .
जो अपने थे संगी साथी
एक एक कर हो गये बागी
खुद को खुदा समझ बैठे अब
बैठ अकेले दाढी नोचो .
उठो लाल आगे को देखो
क्यों हारे थे इस पर सोचो .
कहां गये वो जगरी भगरी
क्यों ना औतर पाये डंगरी .
फिर से द्याप्तों को औतराओ
दोबारा से पूछ कराओ .
कैसा था वो इस्टिंग हरदा
जनता के पलडे में तोलो .
उठो लाल आगे को देखो
क्यों हारे थे इसपर सोचो .
रोडवेज की खच्चाडा में
बुडज्यू को जो सफर कराया .
मधुली आमा को पिनसिन दी
वो भी तेरे काम न आया .
दो हजार बाईस की खातिर
और नयी कुछ तिकडम सोचो .
उठो लाल आगे को देखो
क्यों हारे थे इसपर सोचो
गैरसैण में टैन्ट लगाकर
झूठे सपनों को दिखलाया .
केदारेश्वर का सब पैसा
सूफी गायक को भिजवाया .
कैसे हों आबाद पहाड़ी
कैसे रुके पलायन सोचो
उठो लाल आगे को देखो
क्यों हारे थे इसपर सोचो .
गांव गांव सब उजड रहे थे
फसल खा रहे सूअर बन्दर
लोगों को तुम दिखा रहे थे
गौलपार में खली का दंगल
पब्लिक को मत उल्लू समझो
जनता की तो नब्ज टटोलो
उठो लाल आगे को देखो
क्यों हारे थे इसपर सोचो .
( विनोद पन्त 'खन्तोली ' )
चुनाव हारने के बाद हमारे प्यारे हरदा आजकल आत्ममन्थन कर रहे हैं बल .. पिछले दिनो हरदा ने एक कविता जो आपने बचपन में पढी होगी उसकी टांग तोडने की कोशिस की थी बल .. हरदा ने चैलेन्ज दिया था पक्ष या विपक्ष में इस कविता को लिखने की . लो जी मैने लिख मारी ..कोई इस कविता को हरदा तक पहुचा देना हो . पक्ष या विपक्ष हरदा खुद तय कर लें .. और हां पांच हजार भी भिजवा देना बल हो . बीडि सलाई का भी खरचा चल जाय तो बहुत ठैरा -
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