पार्टी

गरीब आदमी गरीब ही होता है . वह कितनी भी कोशिस कर ले उसका रहन सहन चाल ढाल उसे गरीब धोषित कर ही देते हैं . अब मुझे ही लें किसी अमीर आदमी के लड़के की शादी का कार्ड आ गया . जिस पर प्रतिष्ठा में और मान्यवर जैसे शब्द मेरी नाम की शोभा बढा रहे थे . हालांकि ये शब्द कार्ड छपवाने वाले ने अपनी अमीर बिरादरी की शान में छपवाये होंगे . पर उसकी मेरे प्रति उदारता देखिये उसने मान्यवर और प्रतिष्ठा में जैसे शब्द मुझे दिये गये कार्ड में भी यथावत रहने दिये . हालाकि इन शब्दों की गरीब को आदत नहीं होती . उसका पाला तो अबे तबे जैसे शब्दों से पड़ता है .
अब साहब कार्ड चूंकि सपरिवार था . मैं भी नियत समय पर नियत स्थान पर सपरिवार पहुंच गया . बच्चे खुश थे कि पार्टी में जा रहे हैं . गरीब के बच्चों के लिए यही एकमात्र पार्टी होती है .
हम स्वरुचिभोज स्थल के गेट पहुंचे . गेट पर स्वागत के लिए एक तरफ शहनाई वादक और एक तरफ कार्टूननुमा संतरी था . कार्टून नुमा संतरी सभी मेहमानों का झुक कर अभिवादन कर रहा था . मैं ठिठक गया . संतरी झुका तो हर जगह झुकने की आदत के कारण मैं उससे ज्यादा झुक गया . मेरा परिवार डरकर मेरे पीछे पंक्तिबद्ध हो गया . कार्टून पात्र मेरी दशा समझ चुका था . उसने डन्डे से इशारा कर मुझे भीतर जाने का मूक आदेश सा दिया . हालाकि उसका मन मुझे डन्डा मारने का कर रहा होगा कि कहां से आ जाते हैं असभ्य और समाज के कायदे कानून विहीन प्राणी . पर जाने दो मेरे बाप का क्या जाता है टाइप के भाव उसके चेहरे से साफ परिलक्षित हो रहे थे .
अन्दर जाते ही एक वीडियोग्राफर अपना कैमरा सभी आगन्तुकों पर घुमा रहा था . मैं भी वहां रुक गया . पर वीडियो कैमरा भी सरकारी योजनाओं की तरह विशिष्ट अतिथियों पर ही केन्द्रित हो रहा था . हम आगे बढे तो मेजवान अतिथियों का स्वागत कुछ यूं कर रहे थे - क्या बात भाभीजी बच्चे नहीं आये .. या आपने दर्शन देकर हमें धन्य कर दिया .हमारी तरफ देखकर टालू अन्दाज में खाने की तरफ इशारा कर दिया . मानो यूं कह रहा हो - जाओ भुख्खड़ो ठूंस लो इसीलिए तो तुम आये हो . मेजवान अमीर अतिथियों के साथ फोटो भी खिचवा रहे थे .
अब हम भोजन की तरफ बढे . बच्चे चाउमीन की तरफ तो श्रीमती जी चाट के स्टाल बढ गयी . यहां भी अमीर गरीब का भेद स्पष्ठ दिखाई दे रहा था . अमीरों के बच्चे चाउमीन पावभाजी डोसा इत्यादि चख कर उसमें कमी निकालकर डस्टबिन में फैंक रहे थे . हमारे बच्चे सिर्फ चाउमीन ही ले पाये और सारी प्लेट चाट गये . हमारे बच्चों को ये कायदा कहां आता है कि ऐसी पार्टियों में खाया कम जाता है कूड़ें में ज्यादा डालना होता है .
अचानक चाँट के स्टाल पर मेरी नजर पड़ी तो मेरी नैनो मेरा मतलब मेरी बीबी वहां पर खड़ी अमीरों की स्विफ्ट डिजायर होन्डासिटी जैसी फैसनेबल बीबियों के बीच संधर्ष कर रही थी . वो अमीरों की बीबियों को ओवरटेक करने की नाकाम कोशिस कर रही थी . भला नैनो कार इतनी महंगी लक्जरी गाड़ियों को कहां ओवरटेक कर पाती . मेरी श्रीमती जी उचक उचक कर चांट वाले से भैय्या भैय्या की आवाज लगाती हुई ऐसी लग रही थी जैसे डिप्पर के साथ हार्न बजाने पर भी बेचारी को पास नहीं मिल पा रहा हो. कसम से मेरी गरीबन उन अमीरनों में अलग ही लग रही थी . हाफ ब्लाउज और साड़ी में दिसम्बर की कडकड़ाती ठंड को चिढाती वोमहिलाऐ और स्वेटर शाल लपेटे हमारी श्रीमती कहां मुकाबला होता .ब्यूटी पार्लर का जादू साठ साल की महिलाओ को जवान किये हुए था .
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .
का महामन्त्र मानो इन्ही महिलाओं पर सिद्ध हो गया हो .
इन साठ वर्षीया नवयौवनाओं के सौन्दर्य के सामने हमारी तीस वर्षीया बीबी बुढिया लग रही थी . पर दुर्गा सप्तशती का एक अन्य श्लोक हमारे मन को तसल्ली दे रहा था - पत्नी मनोरमा देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् .
जब सभी अमीर महिलाऐं चाँट खाकर खाने की तरफ जा चुकी तो चाँट वाले की चटनी खतम हो चुकी थी . उसने एक टिक्की पर नमक बुरक कर मेरी बीबी की तरफ बढा दी . श्रीमती जी स्वाद की जगह इस सन्तोष का आनन्द उठा रही थी कि उसे आखिर चाँट मिल ही गयी .
अब मेरी मंजिल भोजन की तरफ थी . वहां का दृश्य दिल को बैठा देने वाला था . शाही पनीर . मिक्स वेज . दालमखनी .पनीर कोरमा.ड्राईफ्रूट सब्जी .पनीर नान . बटर नान . स्टफनान . रूमाली रोटी . तवा सब्जी जैसे प्रतिष्ठित भोजनों पर या तो नोटबन्दी के दौरान ए टी एम की तरह लम्बी लाइन थी या अमीरों का कब्जा था .
अब मेरे सामने दो ही विकल्प थे या तो अमीरों के बीच घुसने की गुस्ताखी करूं या आलू गोबी या ऐसी ही कुछ सब्जियां लेकर अपनी भुख मिटा लूं . मुझे दूसरा रास्ता सही लगा . मैने कम पाँपुलर भोजन की तरफ रूख किया . अब समस्या रोटी की थी . अचानक मुझे याद आया मैं भी निमन्त्रण पत्र के हिसाब से प्रतिष्ठा में का हकदार हूं . पर रोटी नान आदि के स्टालों पर हाथ में प्लेट लिये लोग उमड़े हुए थे . एक नान की तरफ दस दस हाथ लपक पड़ते . यही हाल तवा रोटी रूमाली रोटी का भी था . मैं भी भीड़ में घुस गया . पर हमारा नम्बर आना तो दुर रोटी सेकने वाला मेरी तरफ देख भी नहीं पा रहा था . अमीर और दबंग लोग फटाफट रोटी देने का आदेश देकर रोटी हड़प ले रहे थे . कोई कहता करारी सेक . कोई कहता इसमें घी लगा कर दे . कोई कहता नरम नरम दे . इन आदेशों के कारण रोटी वाला हमारी कातर दृष्टि को देखकर भी अनदेखा कर रहा था . हमने भी अमीरों की देखादेखी फटाफट रोटी देने का फरमान सुनाया तो रोटी वाला भड़क गया . तैश में आकर बोला ज्यादा जल्दी है तो खुद सेक ले . आदमी हूं मशीन नहीं . मैं अवाक रह गया . रोटी वाला अमीरों के सामने बोल नहीं पा रहा था सारा गुस्सा मुझ पर उतार दिया . मैं चुनाव में जमानत जब्त करा चुके बागी उम्मीदवार की तरह वहां से खिसक लिया और ठन्डी पूड़ियां ही लेकर चबाने लगा. पूड़ी खा चुकने के बाद गाजर के हलवे की तरफ गया . वहां जाकर देखा तो सूट बूट धारियों को तो काजू बदाम वाला हलवा परात के उपर उपर से मिल रहा था . मुझे परात के उस भाग से परोस दिया जहां अभी अभी दूध डाला था . मुझे तो ये भी अच्छा ही लगा . खाने के बाद बूरा फांकने वाले के लिए तो ये महान चीज थी . यही हाल हर जगह था . हमारे लिए हर जगह जद्दोजहद ही थी . इज्जत का फालूदा ही बन रहा था पर यह हमारे लिए नयी बात नहीं थी . हम वापसी में पार्टी की तारीफ करते हुए घर की तरफ चल दिये . बस ये सन्तोष था कि एक सौ एक रुपये में चार आदमियों ने खाना खा लिया ..

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