सब्जी खरीदने बाजार गया . बल्कि यूं कहिये भेजा गया . दरअसल मैं पत्नी को शाम की सब्जी के लिए सौ रुपये दिया करता था . पत्नी के लाख समझाने पर भी ये मानने को तैयार नहीं था कि आजकल सौ रुपये में सब्जी नहीं आती . खैर श्रीमती जी ने मेरे हाथ में बहत्तर रुपये दिये और सब्जी की लिस्ट पकडाते हुए कहा - जाओ सौ रुपये की सब्जी ले आओ . मैं अखबार तो पढता ही हूं तो ये समझ चुका था कि सौ रुपये में जी एस टी कट चुका है . बाजार गया तो देखा टमाटर को सब्जी के दुकानदारों ने अपने गल्ले के बिलकुल पास रखा था आम आदमी के पहुंच से दूर . मैने सब्जी वाले से विरोध किया - भाई ये टमाटर इतनी दूर क्यों रखे हैं ? सब्जीवाला दार्शनिक अन्दाज में बोला - हे फटीचर मेरा मतलब कविवर टमाटर का दूर रखा जाना इस बात का द्योतक है कि टमाटर आम आदमी की पहुंच से दूर जा चुका है . हर चीज के दिन फिरते हैं . जिन टमाटरों को तुम लोग पिलपिलाकर चैक किया करते थे वो आज तुम्हें और तुमारी जेब को चैक कर रहे हैं . तुम्हें और तुम्हारी औकात को पिलपिला रहे हैं . तुमने टमाटर को कभी गौर से देखा है ? उसके सिर पर ताज सजा होता है . वो एक प्रकार से सब्जियों का...
गोपाल सिंह - ओ पन्थ्याण ज्यू ... ओ पन्थ्याण ज्यू ... आम् - हो ओ ओ ओ .... गोपाल सिंह - ओ पन्थ्याण ज्यू पैलाग .. आम-आशीर्वाद .कांक छा ..?? गोपाल सिंह- पार दबक गौं क छ्यू .. गोपाल सिंह .. आम् कि- कूंछिया ..कां जाणी छिया के नै हो पन्थ्याणि ज्यू . इथैके कति कुमिना क सुद्याव लागि रौछ्यू .. कैलि कौ तुमार यां छ कैबेर . तबै आयूं . ह्वलै तुमार यां कुमिन .. नानू ले देला जब हैजाल . आम- होय क्यैने .. छ .. क्यै कि चैन पडौ तुमन कुमिन . कति पुज छ कि ? गोपाल सिंह- नै पन्थ्याण ज्यू बौज्यू बीमार हैरान . के नै पचणौय . कैलि कौ कुमिन न साग दिओ कैबेर . तबै चैन हैरौ . छ जबत दि हालौ . आम- होय होय क्यै नै छ . अल्लै दयू हां . गोपाल सिंह - होय पन्थ्याण ज्यू भल हैजौ तुमर . कतु छन नानतिन . आम- तीन छन गोपाल सिंग (अं ) .. एक च्योल द्वि चेल्ली . गोपाल सिंह- कां छ तुमर छ्यौड .. कि कनौं ..? आम- दिल्ली पन छ . गोपाल सिह- कि कनान तुमार छ्यौड. दिल्ली में . भली नौकरी में हुन्याल हाय . आम- बस पेट पावण रौ गोपाल सिंग ज्यू आपुण . जि करनन्योल . आपुणै ले पेट पाव हाललौ मस्तु भोय . गोपाल सिंह - हेय ! आम - तीन म्है...
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